पैगंबर मोहम्मद की बीमारी की शुरुआत in Hindi

पैगंबर मोहम्मद की बीमारी की शुरुआत

पैगंबर मोहम्मद की बीमारी की शुरुआत

हिज्जतुल-वदा को अभी तीन महीने से ज़्यादा न गुज़रे थे कि प्यारे नबी
( पैगंबर मोहम्मद ) पर बीमारी का हमला हुआ- और वह भी इतना
ज़ोरदार कि इससे पहले कभी न हुआ था।


बीमारी की शुरुआत इस तरह हुई कि एक रात आप ( पैगंबर
मोहम्मद ) बिस्तर से उठे। अपने गुलाम अबू-मुऐहबा को उठाया
और फ़रमाया अबू-मुऐहबा! मुझे अल्लाह का हुक्म मिला है। 



इस वक़्त जाकर बक़ीअ ( क़ब्रिस्तान ) वालों के लिए मग़फ़िरत की
दुआ करनी है। तुम भी मेरे साथ चलो! आप ( पैगंबरमोहम्मद ) उन्हें
साथ लेकर घर से निकले! क़ब्रिस्तान पहुँचे तो फ़रमाया
"तुम पर सलामती हो, ऐ क़ब्रवालो!"



तुम्हें मुबारक हो वह जगह जहाँ तुम पहुँच गए। तुम्हारी जगहें ज़िन्दा
रहनेवालों की जगहों से बेहतर हैं।


पैगंबर मोहम्मद की बीमारी की शुरुआत in Hindi




मैं देख रहा हूँ कि फ़ितने आ रहे हैं, इतने अन्धकारमय फ़ितने जैसे
अधरी रात के हिस्से। एक फ़ितने के बाद दूसरा फ़ितना आएगा और
बाद में आनेवाला हर फ़ितना अपने से पहलेवाले फ़ितनों से बदतर
होगा। इस अवसर पर आप ( पैगंबरमोहम्मद ) ने बहुत देर तक
क़ब्रिस्तानवालों के लिए दुआएँ कीं। 



गुलाम कहते हैं कि फिर आप मेरी तरफ़ मुतवज्जेह 8 और कहा,
“अबू-मऐहबा! मुझे दुनिया के ख़ज़ानों की कुंजियाँ दी ६ कि मैं उनके
बीच हमेशा रहूँ कि जन्नत मैं चला जाऊँ। एक ओर दुनिया के ये
खजाने हैं और फिर जन्नत। दूसरी ओर अपने रब की मुलाक़ात है और जन्नत।


__“मेरे माँ बाप आप पर करबान जाएँ आप दुनिया के ख़ज़ानों में
रहना पसन्द कर लीजिए बाद में जन्नत में चले जाइए" अबू-मुऐहबा
ने बड़ी विनम्रता के साथ अपने दिल की बात कह दी।

"नहीं, अबू-मुऐहबा! मैंने तो अपने रब से मुलाक़ात और जन्नत को
पसन्द कर लिया। नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) ने अबू-मुवबा का तसल्ली
दी।"


फिर नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) कुब्रिस्तान से वापस आ गए। यह
हिजरत का 11वाँ साल था। बुद्ध की रात थी। सफ़र माह की आखिरी
तारीखें थीं या रबिउल-अव्वल का पहला हफ्ता था। जिस रात की
सुबह आप ( पैगंबर मोहम्मद ) की तबीअत ख़राब हो गई। उस
दिन आप हज़रत जैनब (रजि.) के यहाँ थे।


सुबह को हज़रत आइशा (रजि.) के पास से नबी ( पैगंबर मोहम्मद )
का गुज़र हुआ। देखा तो वे सिर के दर्द में ग्रस्त थीं और बेक़रारी में कह
रही थीं, "हाय मेरा सिर!" प्यारे नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) ने यह देखकर फ़रमाया, “आइशा, ख़ुदा की कसम! मेरे सिर में तो और भी ज्यादा दर्द है। हाय मेरा सिर!"


हज़रत आइशा (रजि.) दोबारा कराहीं, “हाय मेरा सिर!!" नबी
( पैगंबर मोहम्मद ) ने तफ़रीह के अन्दाज़ में फ़रमाया, “आइशा!
क्या नुक़सान है अगर तुम मुझसे पहले मर जाओ? कि ख़ुद मैं अपने
हाथों से कफ़न पहनाऊँ, तुम्हारी नमाज़ पढ़ाऊँ और ख़ुद ही अपने
हाथों से तुम्हें क़ब्र में उतारूँ!!"


_जवान आइशा (रजि.) ने जवाब दिया,
कौई और बीवी इसके लिए ज़्यादा अच्छी रहेगी।"


हज़रत आइशा (रजि.) की बात सुनी तो नबी ( पैगंबरमोहम्मद ) के
होंठों पर मुस्कराहट खेलने लगी। लेकिन तकलीफ़ बहुत ज्यादा थी।
आप इससे ज़्यादा तफरीह न कर सके।


प्यारे नबी (सल्ल.) का नियम था कि एक-एक दिन प्रत्येक बीवी के
यहाँ ठहरते। बीमारी की हालत में भी आपके इस नियम में फ़र्क न
आया। बारी-बारी आप हर बीवी के यहाँ जाते रहे। पाँच दिन तक
ऐसा ही चलता रहा। फिर हालत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई। चलने-फिरने की ताक़त न रही।



आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने सारी बीवियों को बुलाया। उनसे किसी एक के घर में ठहरने की इजाज़त चाही सारी बीवियाँ खुशी से तैयार हो गईं। फिर सबकी मर्जी से हज़रत आइशा (रजि.) के घर पर ठहरना तय हो गया।




कमजोरी बहुत ज़्यादा थी। बिना किसी सहारे के चलना आप ( पैगंबर मोहम्मद ) के लिए अब मुमकिन न था। हज़रत अली (रजि.) और हज़रत फज्ल-बिन-अब्बास (रजि.) आपको सहारा देकर बड़ी परेशानियों से हज़रत आइशा (रजि.) के यहाँ लाए। सिर-दर्द की ज़्यादती के कारण आपके सिर पर पट्टी बँधी हुई थी। यह बुद्ध का दिन था। आपकी बीमारी को पूरे आठ दिन हो चुके थे।


मुसलमान उदास-उदास थे। बेचैन और बेक़रार थे। क्योंकि उनका प्यारा बीमारी के बिस्तर पर था और बीमारी हर क्षण बढ़ती ही जा रही थी। इससे पहले कभी आप इस तरह बीमार न हुए थे, इसलिए वे और भी ज़्यादा निराश और फ़िक्रमन्द थे।  हिजरत के छटे साल आप ( पैगंबर मोहम्मद ) को हल्का सा बुखार हुआ था। आपने दो-चार दिन खाने-पीने में परहेज़ किया और उसका असर जाता रहा।


सातवें साल एक यहूदी औरत ने आप ( पैगंबर मोहम्मद ) को ज़हर मिला हुआ गोश्त खिला दिया था। ज़हर के असर से कई दिन बेचैनी रही, लेकिन कुछ दवा-इलाज के बाद उसका असर भी जाता रहा।
ज़िन्दगी में केवल ये दो घटनाएँ हुईं।

इसके अलावा आप ( पैगंबर मोहम्मद ) हमेशा सेहतमन्द और तन्दरुस्त रहे और यह कोई हैरत की बात नहीं, क्योंकि आपके उसूल ही कुछ ऐसे थे कि उनका जो भी पालन करे, बीमारी उसकी तरफ़ निगाह न उठाए।

last hajj of prophet muhammad


आप ( पैगंबर मोहम्मद ) खाना उसी समय खाते जब भूख लगती। खाकर उठते जब भी कुछ भूखे होते।
एक बार की बात है। मिस्र के बादशाह ने आप ( पैगंबर मोहम्मद ) के पास तोहफे में शहद, दो बाँदियाँ ( मारिया और सीरीन) और एक हकीम भेजा।



आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने शहद और बाँदियों को स्वीकार कर लिया और हकीम को यह कहकर वापस कर दिया कि हम लोग तो भूख के बिना खाना ही नहीं खाते और जब खाते हैं तो भूख से कम ही खाते हैं। भला बीमारी का यहाँ कहाँ गुज़र?


इसके अलावा आप ( पैगंबर मोहम्मद ) हमेशा स्वच्छ रहते।
दिन में कम से कम पाँच बार वुजू करते। कपड़े पाक-साफ़ रखते।
गन्दगी से खुद भी नफ़रत करते और दूसरों को भी पाक-साफ़
रहने का शौक़ दिलाते, फ़रमातेमा
“सफ़ाई-सुथराई ईमान का अंग है।"


आप ( पैगंबर मोहम्मद ) कभी सुस्ती और बेकारी को राह न देते।
हमेशा चुस्त और सतर्क रहते, कभी इबादत में व्यस्त होते। कभी
मुसलमानों की भलाई के लिए दौड़-धूप करते और उसके लिए
रात-दिन एक कर देते।


आप ( पैगंबर मोहम्मद ) भोग-विलास के बन्दे और इच्छाओं के
पुजारी न थे। आप की इच्छाएँ भी अल्लाह के अधीन थीं। जितनी ग़लत
लज्ज़तें और नुक्सानदेह दिलचस्पियाँ हैं, उन सबसे आप कोसों दूर थे।
ये ऐसी बातें हैं कि जो भी इनका ख़याल रखे, सेहत और तन्दुरुस्ती
उसके पाँव चूमे। यही कारण है कि जब आप ( पैगंबर मोहम्मद )
बीमार हुए और तबीअत सँभलती हुई मालूम न हुई तो बीवियाँ बेचैन
हो गईं। साथी बेक़रार हो गए।



⇐⇐ PREV                                                                     NEXT ⇒⇒

Post a comment

0 Comments