Arab me Murti purja kab Shuru hui in Hindi

Arab me Murti purja kab Shuru hui 
                                 

Murti Pooja in Arab


बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ('अल्लाह दयावान कृपाशील के नाम से')

इबराहीमी दीन (धर्म) अरब में ज़्यादा नहीं ठहरा। पूरे देश में फिर बुत परस्ती फैल गई। लोग खुदा के साथ मूर्तियों को भी पूजने लगे। उनको खुदा तक पहुँचने का माध्यम और ज़रीआ समझने लगे। उनका अक़ीदा था कि ये ख़ुदा के साझी और हमारे सिफ़ारिशी हैं।

ये ही ज़रूरतों को पूरी करने और मुसीबतों को दूर करनेवाले हैं, इसलिए वे मुसीबतों में उन्हीं को पुकारते, फ़रियादें भी उन ही से करते और मुरादें भी उन ही से माँगते।

हज़रत इबराहीम तो ख़ालिस तौहीद (एकेश्वरवाद) की दावत देते थे और शिर्क और मूर्ति-पूजा से बेज़ार थे, लेकिन ये लोग उनकी शिक्षाओं को बिलकुल ही भूल गए और मूर्तियों के पुजारी बनकर रह गए। लेकिन ऐसा एक दम ही नहीं हो गया। इसमें भी ज़माना लगा।

न जाने कितनी शताब्दियाँ बीत गईं और न जाने कितनी नस्लें गुज़र गईं, तब कहीं जाकर शिर्क के पैर जमे। __यह शिर्क आया कहाँ से? मूर्तिपूजा का चलन हुआ कैसे? बात यह थी कि हज़रत इबराहीम (अलैहि.) और इस्माईल (अलैहि.) से अरबों को अत्यधिक श्रद्धा और मुहब्बत थी।

काबा का निर्माण उन्ही दोनों ने किया था, इसलिए उन्हें काबा से भी बड़ी मुहब्बत थी, फिर यह मुहब्बत यहीं तक सीमित न रही, इसके आस-पास जितने पत्थर थे, वे भी उनकी नज़र में बहुत ही प्रिय और बरकतवाले बन गए।

अब अगर वे मक्का से बाहर जाते, चाहे रोज़गार के लिए, चाहे कारोबार के लिए, तो वहाँ का एक पत्थर भी साथ ले लेते। उनका ख़याल था कि इससे सफ़र में बरकत होगी और मक़सद में कामियाबी।


फिर बात यहीं तक सीमित न रही। जो लोग मक्का से कछ दर रहते थे वे काबा के पास से पत्थर उठा-उठाकर ले गए और अपने यहाँ लगा लिए। अब वे काबा की तरह उनका तवाफ़ (परिक्रमा) करते। हजरे असवद की तरह उनको चूमते।

इस तरह वह अक़ीदा, जिसके ख़िलाफ़ हज़रत इबराहीम (अलैहि.) ने मुसलसल जिहाद किया था, अरब में फिर लौट आया।
Murti Pooja in Arab

फिर एक बात और थी, जिसकी वजह से यह अक़ीदा और तेज़ी से
फैला। ज्वालामुखी पहाड़ फटते तो लावे की शक्ल में जो पत्थर
निकलते उनके बारे में धारणा थी कि ये टूटे हुए सितारे हैं, जो
आकाश से धरती पर आ गए हैं।

यहीं से वे पत्थर पवित्र समझे जाने लगे, क्योंकि कछ जातियों के दिल
में तारों की महिमा रच-बस गई थी इसलिए कि उनमें जगत सृष्टा की
कुदरत का जलवा था, उसकी शक्ति और महानता की छाया थी।

इसलिए जिन पत्थरों के बारे में उन्हें विश्वास होता कि ये सितारों से
टूटे हैं, उनको बहुत बरकतवाला समझते और बड़ी इज़्ज़त करते।
फिर इज़्ज़त का यह ख़याल और आगे बढ़ा और अब उनकी पूजा भी
होने लगी।

नस्लों पर नस्लें गुज़रती रहीं, यहाँ तक कि यह अक़ीदा बिलकुल
पक्का हो गया।

अब कोई भी पत्थर मिल जाता, जो खूबसूरत और सुडौल होता, या
जिसकी बनावट में कुछ नयापन होता, या किसी जानदार की शक्ल
से मिलता-जुलता होता, उसकी महानता उनके दिल में बैठ जाती
और वे उसको पूजने लगते।

फिर एक क़दम और आगे बढ़े। अब वे पत्थरों को खुद काटते-छाँटते।
अपनी पसन्द की मूर्तियाँ बनाते, जिस बुज़ुर्ग या देवता से चाहते, उनका
सम्बन्ध जोड़ देते और जो दिल चाहता उनके नाम रख लेते, फिर
उनको एक जगह स्थापित करके पूजना शुरू कर देते।

प्रेम और श्रद्धा में उनपर भट चढ़ाते, उनके नाम पर मन्नतें मानते।
उनका ख़याल था कि इस तरह वे देवता अल्लाह के यहाँ सिफ़ारिश
करेंगे, बिगड़े हुए काम भी बना देंगे और आख़िरत में मुक्ति और
नजात के साधन भी सिद्ध होंगे।

मक्का में सबसे पहले जो मूर्ति लाई गई और फिर काबा के आँगन
म लगाई गई, वह 'हबल' की मूर्ति थी। उसको लानेवाला व्यक्ति
अम्र-बिन-लुहय्यी था। यह कहीं सफ़र कर रहा था, रास्ते में एक
जगह स गुज़र हुआ। देखा, लोग मर्तियाँ पूज रहे हैं। उसको बहुत
भला मालूम हुआ। उनसे कहा, एक मूर्ति हमें भी दे दो। हम अपने
यहाँ ले जाएँगे।

Post a comment

0 Comments