Last Days of Prophet Muhammad - 2 in Hindi

Last Days of Prophet Muhammad - 2 in Hindi


समान हैं। मेरे बाद जो मुसलमानों का ख़लीफ़ा हो, मैं उसको वीर
करता हूँ कि उनके साथ नेक सुलूक करे।"


फिर आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने फ़रमाया
“मुसलमानो! मैंने वही चीज़ हलाल की है, जो अल्लाह ने हलाल की है।
उसी चीज़ को हराम किया है, जिसको अल्लाह ने हराम किया
मुसलमानो! किसी को मैंने मारा हो तो यह पीठ हाज़िर है, मुझे
भी वह मार ले। किसी को मैंने कुछ कहा हो तो वह भी मुझको कह ले।
किसी का मैंने कुछ लिया हो तो वह मुझ से ले ले।"


एक मुसलमान खड़ा हुआ और बोला“अल्लाह के रसूल! आपके पास
मेरे तीन दिरहम हैं।" आप (पैगंबर मोहम्मद) ने उसको तीन दिरहम
दिए। फिर फ़रमाया"ऐ अल्लाह के रसूल की बेटी फ़ातिमा! ऐ अल्लाह
रसूल की फूफी सफ़िय्या!
अल्लाह के यहाँ के लिए कुछ कर लो। मैं तुम्हें अल्लाह से नहीं बचा
सकता।"


प्यारे नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) के पास बैतुलमाल की नौ अशरफ़ियाँ
थीं। बीमार हुए तो आशंका हुई कि कहीं ऐसा न हो कि मौत आ जाए
और ये अपने ही पास रह जाएँ। हुक्म दिया कि इन्हें ग़रीबों को दे दिया
जाए। लेकिन सब लोग तो आप ( पैगंबर मोहम्मद ) की देखभाल में
व्यस्त थे, इसलिए किसी को आपका हुक्म याद न रहा।


इन्तिक़ाल से एक दिन पहले आपको फिर ख़याल आया तो पूछा"वे
अशरफ़िया क्या हुईं?" हज़रत आइशा (रजि.) ने कहा, “अल्लाह के
रसूल! वे घर ही में


आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने वे अशरफ़ियाँ मँगाई और हज़रत आइशा
(रजि.) ने हाज़िर कर दीं। उनको आपने हथेली पर रखा और फ़रमाया


“अगर मुहम्मद को मौत आ गई और ये उसके पास ही रखी रह गईं तो
वह अपने रब को क्या जवाब देगा?"

फिर आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने उनको कछ गरीब मसलमानों में
बाँट दिया।


तकलीफ़ बहुत बढ़ गई। बुखार इतना तेज़ हुआ कि पूरा शरीर
गा। चहेती बेटी फ़ातिमा (रजि.) रोज़ बाप की ख़िदमत में हाजिर
होती। आप उन्हें देखकर स्नेह से खड़े हो जाते, उन्हें चूमते और
अपने पास बिठा लेते। आज बला की बेचैनी थी। कमज़ोरी भी बहुत
ज्यादा थी। हज़रत फ़ातिमा (राज.) आइ ता आप उठकर प्यार न कर
सके। वे पास आईं। स्वयं उन्होंने आपको चूमा और पहलू में बैठ गईं।



बुखार इतना तेज़ था कि बार-बार आप (पैगंबर मोहम्मद ) बेहोश हो
जाते। पास ही एक बर्तन में ठण्डा पानी था। आप उसमें हाथ डालते
और चेहरे पर मलते। बेचैनी बहुत थी। ठीक उसी वक़्त आपके होंठ
हिले और कानों ने ये शब्द सुने
 “यहूदियों और ईसाइयों पर अल्लाह की लानत हो कि वे अपने
पैग़म्बरों की क़ब्रों पर सजदे करने लगे।"



सोमवार की रात हुई तो बुख़ार कम हो गया। ऐसा लग रहा था मानो
बुख़ार जाता रहा। बेचैनी नाम को न थी। तबीअत को बिलकुल सुकून
था। जिसने देखा, समझा आप ( पैगंबर मोहम्मद ) अच्छे हो गए।
उदास चेहरे फिर चमक उठे। मुरझाए हुए दिल फिर लहलहा उठे।



आप ( पैगंबर मोहम्मद ) का कमरा मस्जिद से मिला हुआ था।
सुबह हुई तो आपने पर्दा उठाकर देखा कि सच्चे साथी फ़ज्र की
नमाज़ में व्यस्त थे। देखकर आप मुस्करा दिए कि अल्लाह की ज़मीन
पर आख़िर वह गरोह पदा हो गया, जो आपकी शिक्षाओं का नमूना
बनकर अल्लाह की याद म लगा हुआ है। 



कुछ आहट हुई तो साथी समझे कि आप बाहर आना चाहते हैं। वे
खुशी से बेताब हो गए और क़रीब था कि वे नमाज़ तोड़ १ हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) इमाम थे। उन्होंने चाहा कि पीछे हट जाएँ। पाकन
आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने इशारे से मना कर दिया। फिर कमरे के
अन्दर कर पदी गिरा दिया। कमज़ोरी इतनी ज़्यादा थी कि पर्दा भी
अच्छी तराह ना गिरा सके।




 पैरों पर खड़े होना भी कठिन था, लेकिन साथिया को खुश देखकर
आप भी बेहद खुश थे। कमजोरी हर क्षण बढ़ती जा रही थी। मौत
धीरे-धीरे सरकती आ रही थी



आपने बर्तन में ठण्डा पानी माँगा। तुरन्त पानी पेश कर दिया आप
बार-बार उसमें हाथ डालते. और चेहरे पर मलते। चादर



कभी मुँह पर डाल लेते, कभी हटा लेते। उस समय निरन्तर आपके
मात से ये शब्द निकल रहे थे ।



“ऐ अल्लाह! नज़ा (जान निकलने) के समय की परेशानियों का झेलना
मेरे लिए आसान कर दे।"



_प्यारे बाप की बेचैनी देखकर हज़रत फ़ातिमा (रजि.) बेचैन हो गई। वे
खुद ब खुद पुकार उठी, "हाय मेरे बाप की बेचैनी!" आपने सना तो फ़रमाया, “आज के बाद फिर तुम्हारा बाप बेचैन न होगा।"



दोपहर के बाद का समय था। सीने में साँस घड़-घड़ा रही थी। इतने में आप ( पैगंबर मोहम्मद ) के होंठ हिले और कानों में यह आवाज़ आई
"नमाज़ और गुलामों से अच्छा सुलूक।"



फिर हाथ ऊपर उठे। आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ने उँगली से इशारा
किया और फ़रमाया, “अब और कोई नहीं। बस वही सबसे बड़ा साथी।"



यही कहते-कहते हाथ लटक आए। आँखें छत से लग गई और पवित्र
आत्मा रब से जा मिली। सोमवार का दिन था। रबीउल-अव्वल की बारह
तारीख्न थी। 


हिजरत का ग्यारहवाँ साल था। जाँनिसारों की नज़र में दुनिया अँधेरी हो गई और दिल की बस्ती में सन्नाटा छा गया। 'निस्सन्देह हम अल्लाह ही के हैं और बेशक उसी की ओर लौटने वाले हैं। ऐ अल्लाह! सलामती हो प्यारे नबी पर, उनकी सन्तान पर और उनके सब साथियों पर।' इन्तिक़ाल के समय आप ( पैगंबर मोहम्मद ) की उम्र 63 साल थी।


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