Death of Prophet Muhammad || Last Prophet of Islam


Death of Prophet Muhammad
Prophet Muhammad Dome with Kaaba
'क्या सचमुच अल्लाह के रसूल
चल बसे?'
जो मुसलमान भी यह दिल
दहलानेवाली ख़बर सुनता,
उसकी ज़बान पर यह
सवाल आ जाता।


यह कैसे सम्भव है? अभी
कुछ ही घण्टे पहले तो
उन्होंने आप
( पैगंबर मोहम्मद )
को देखा था। आपने
उनसे बातें भी की थीं।
यह कैसे मुमकिन है? 

आप (सल्ल.) तो
अल्लाह के चहेते हैं।
अल्लाह ने आपको नबी
बनाया है। आप हजारों लोगों
के लिए आँखों की ठण्ड
आर व सुकून हैं।

यह कैसे मुमकिन है?
आप ( पैगंबर मोहम्मद ) तो एक
ईश्वरीय शक्ति हैं। आप ही ने तो
परी दतिया को हिलाकर रख दिया।
तमाम शैतानी ताक़तों को धूल
चटा दी। ऐसा नहीं हो सकता।

यह कैसे मुमकिन है?
आप ( पैगंबर मोहम्मद ) ही ने
तो इनसानों को अँधेरे से उजाले में
पहुँचाया है। मगही से निकाल कर
सीधे रास्ते पर लगाया है। अब कौन
इन्हें सँभालेगा? कौन इनका रहनुमाई
करेगा?

यह कैसे मुमकिन है?
आपकी मृत्यु से तो वह्य रुक जाएगी,
जो अब तक किसी नबी की मृत्यु
से नहीं रुकी।

हजरत उमर (रजि.) ने यह गमनाक
खबर सनी तो पाँवों तले से ज़मीन
सरक गई। वे अन्धाधुन्ध आइशा
के घर की तरफ़ दौडे कि इस
बुरी ख़बर की मालूमात करें। पहुँचे
तो वहाँ आप ( पैगंबर मोहम्मद )
की पवित्र देह पर चादर पड़ी थी।

हज़रत उमर (रजि.) ने चहरे से
चादर हटाई। देखा तो आप
( पैगंबर मोहम्मद ) बिलकुल
बेहरकत थे। अब शक की क्या गुंजाइश
थी? मौत का यक़ीन करना ही पड़ा।
एक ज़रा सी आस थी। वह आस
भी जाती रही। उनपर ग़मों का पहाड़
टूट पड़ा। वे कलेजा पकड़ कर
रह गए।

फिर वे मस्जिद गए। देखा तो
लोग सिसकियाँ ले रहे थे।
रोते-रोते लोगों का बुरा हाल था।
आँसू थे कि थमते ही न थे।
किसी को सब्र आए तो
कैसे आए! दिल को क़रार
आए तो कैसे! आज सभी साथियों
के दिल शोकाकुल थे। आँखें सजल थीं।
कलेजे मुँह को आ रहे थे। आज किसी
से किसी की हालत देखी न जाती थी।

आप ( पैगंबर मोहम्मद ) के इन्तिक़ाल
की दुख भरी ख़बर हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) का भी मिली। सुनते ही
वे तड़प उठे। तुरन्त मस्जिद
पहुँचे। वहाँ सच्चे साथियों की भीड़ थी। हर
एक बेक़रार था। दुख से
निढाल था। वे किसी से कुछ न बोले। सीधे
हज़रत आइशा (रजि.) के
घर गए। प्यारे नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) के
शरीर पर चादर थी। चेहरे
से चादर हटाई। 

माथा चूमा। फिर फ़रमाया : “ऐ
अल्लाह के रसूल! मेरे माँ-बाप आप
पर कुरबान!
अल्लाह के रसूल ( पैगंबर मोहम्मद )
आपके चले जाने से तो पैग़म्बरी का
सिलसिला ख़त्म हो गया। जो किसी
भी पैग़म्बर के जाने से ख़त्म नहीं हुआ।


अल्लाह के रसूल आपकी महानताएँ
न ज़बान से बयान हो सकी, न
आँसुओं से उनका हक़ अदा हो
सके। अल्लाह के रसूल अगर यह
मौत खुद आपकी पसन्द की हुई न
होती तो आपको बचाने के लिए हम
अपनी जानें पेश कर देते और अगर
आपने रोने से मना न किया होता तो
आप पर रोते-रोते अपनी आँखें ख़श्क
कर लेते। अलबत्ता जो चीज़ हमारे
अधिकार में नहीं वह दुख और ग़म
की वह आग है जो कभी ठण्डी होनेवाली
नहीं। ऐ अल्लाह तू नबी की ख़िदमत में
हमारा सलाम पहुँचा दे। 

ऐ मुहम्मद! अपने रब के यहाँ हमें
भी याद कीजिएगा। अपने मुबारक
दिल में हमारी यादों के चिराग़ रौशन
रखिएगा।

अल्लाह के रसूल! अगर आप हमारे
लिए शान्ति और इत्मीनान का सामान
न छोड़ जाते तो आपके चले जाने से
जो नीरसता उत्पन्न हो गई है उसके
साथ हम जीवित न रह पाते। ऐ अल्लाह।
हमारा यह पैग़ाम अपने नबी को
पहुँचा दे और हमारे अन्दर उनके
मिशन को ग़ालिब कर दे।

Death of Prophet Muhammad

हज़रत अबू-बक्र (रजि.) ने इस तरह
सहसा अपना दर्दे-दिल कह सुनाया।
खुद भी रोए और दूसरों का भी रूलाया।
फिर वापस मस्जिदे नबवी आए तो देखा
कि हज़रत उमर (रजि.) की तक़रीर हो
रही थी। वे लोगों को समझा रहे थे।
हज़रत अबू-बक्र को देखकर लोग उनके
पास जमा होने लगे।


 जब सारे लोग जमा हो गए तो
हज़रत अबू-बक्र ने यह तक़रीर
की “लोगो! अगर कोई मुहम्मद
( पैगंबर मोहम्मद ) की बन्दगी
करता था तो मुहम्मद ( पैगंबर मोहम्मद )
तो इस दुनिया से जा चुके और अगर कोई
अल्लाह की बन्दगी करता था तो
अल्लाह ज़िन्दा है। उसके लिए कभी
मौत नहीं।


मुसलमानो! अल्लाह ने तो तुम्हें पहले
से ही नबी ( पैगंबर मोहम्मद ) की मौत
का खबर दे दी थी। तो तुम ग़म की
शिद्दत में इस बात को भूल न जाओ।

मुसलमानो! हमारे इत्मीनान के लिए
क्या यह बात काफ़ी नहीं कि अल्लाह
ने अपने नबी के लिए इस दुनिया की
परेशानियों के बजाए


अपने पास से सुख-चैन और आराम
को पसन्द किया। उसने आप मल)
को इस दुनिया से उठा लिया और
अपने इनाम और नवाजिश की
दनिया में पहुँचा दिया और तुम्हारे
अन्दर अपनी किताब और अपने
नबी की सुन्नत बाक़ी रखी। जो इन को
दोनों पकड़े रहेगा वह नेकी की राह पर कायम रहेगा और जो इन
दोनों को अलग-अलग करेगा
वह ग़लत राह पर जा पड़ेगा।

मसलमानो! होशियार रहो। शैतान
तुम्हें तुम्हारे नबी की मौत में व्यस्त
न कर दे और इस तरह तुम्हें तुम्हारे
दीन से दूर न कर दे।
। तुम जल्द से जल्द वह तरीक़ा और
वह अन्दाज़ इख़्तियार करो जिससे
शैतान को नाकाम कर सको। उसे
इतनी मोहलत न दो कि वह तुम्हारा
आशियाना तबाह कर डाले।

फिर कुरआन की यह आयत पढ़ी
और मुहम्मद तो बस अल्लाह
के रसूल हैं। उनसे पहले बहुत
से नबी गुज़र चुके। क्या अगर वे
मर जाएँ या (अल्लाह की राह में)
मारे जाएँ तो क्या तुम उलटे पाँव
इस्लाम से फिर जाओगे? और
जो कोई फिर जाएगा वह अल्लाह
का कुछ नहीं बिगाड़ेगा और अल्लाह
इस नेमत की कद्र करनेवालों को
अच्छा बदला देगा।” 
(कुरआन, 3:144) 

यह था वह विवेकपूर्ण भाषण, जो हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) ने उस समय
दिया। मुसलमानों ने सुना तो उनकी
आँखें खुल गईं और इस कड़वी
हक़ीक़त का उन्हें यक़ीन करना पड़ा।
सबको ऐसा महसूस हुआ कि
यह आयत आज ही उतरी है। हर
मुसलमान की ज़बान पर यही आयत
थी। और इसी की चर्चा थी।

मुसलमानों के दिल आप ( पैगंबर मोहम्मद )
के प्रेम और श्रद्धा से भरे हुए थे।
आपके इन्तिक़ाल की खबर उनपर
बिजली बनकर गिरी। सुनते ही वे
बदहवास हो गए। उनपर गम के
बादल घिर आए और निराशा की
घटा छा गई। हज़रत अब-बक्र (रजि.)
ने करआन की आयत पढ़ी तो
उनकी आँखें खुलीं और उन्हें
होश आया।

हज़रत उस्मान (रजि.) का
क्या हाल था? उनके भी हो
आर ग़म इतना
ज्यादा था कि ज़बान पर
ताला लग गया था।
हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-उमर
(रजि.) फ़रमाते हैं, “यों
समझना चाहिए
जैसे हमारी आँखों पर पर्दे
पड़े थे। वे पर्दे हट गए।"

यही नहीं, बल्कि तमाम
मुसलमानों का यही हाल था, लेकिन हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) ने भाषण दिया
तो सबकी आँखें खुल गईं। उन्हें
यक़ीन
हो गया कि प्यारे नबी
(पैगंबर मोहम्मद ) सचमुच अल्लाह
को प्यारे हो गए। 6 हज़रत अबू-बक्र (रजि.)
का इस अवसर पर क्या हाल था? वे
धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति
और संयम का पहाड़ थे। वे इस
नाजुक मोड़ पर सही रहनुमाई
का बेहतरीन नमूना थे।

हज़रत अबूबक्र (रजि.) को प्यारे
नबी (पैगंबर मोहम्मद ) से कम मुहब्बत न थी। वफ़ादारी और
जाँनिसारी में भी वे किसी से पीछे न थे। पहले उल्लेख हो चुका है कि
प्यारे नबी (पैगंबर मोहम्मद )
ने जब कुरआन की यह आयत पढ़ी
“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा
दीन पूरा कर दिया और अपनी
नेमत तुम पर पूरी कर दी और तुम्हारे
लिए दीन इस्लाम को पसन्द किया।"

Death of Prophet Muhammad

तो हज़रत अबू-बक्र (रजि.) रोने
लगे और जब यह सूरः उतरी “जब
अल्लाह की मदद आ जाए
और विजय प्राप्त हो जाए और
तुम देखो
कि लोग अल्लाह के दीन में
गरोह के गरोह दाखिल हो
रहे हैं, तो
अपने रब की तारीफ़ और शुक्र
अदा करो और उससे नजात की दुआ
करो। वह तो बहुत ज़्यादा तौबा
क़बूल करनेवाला है।'

(कुरआन-सूरा नस्र) तब भी हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) बेकाबू हो गए थे
और आँखों से आँसुओं की झड़ियाँ
लग गई थीं, क्योंकि वे समझ गए थे
कि अब आप (पैगंबर मोहम्मद )
के दिन निकट आ गए हैं और यह
\बुरा दिन देखने के लिए पहले ही
से तैयार हो गए।

यही वजह है कि प्यारे नबी
(पैगंबर मोहम्मद ) का इन्तिक़ाल
हुआ तो हर तरफ़ कुहराम मच
गया। मुसलमान कलेजा थाम-थाम
कर रोने लगे। कितने ही बेखुद
और बदहवास हो गए, लेकिन
हज़रत अबू-बक्र (रजि.) घय
आर सहनशीलता की प्रतिमर्ति
बने रहे और इस नाजूक समय
में उन्होंने मुसलमानों की सही
रहनुमाई करते रहे।

यह अल्लाह के इस्लाम दीन
पर बहुत बड़ी मेहरबानी है और
मसलमानों के साथ बहुत बड़ा
एहसान है कि ऐसे ख़तरनाक समय
में हजरत अबू-बक्र (रजि.) ने उनको
सही राह सुझाई, फिसलते हुए
उन्हें सँभाल लिया और उनमें फूट
पड़ने से बचा लिया।

Death of Prophet Muhammad

प्यारे नबी (पैगंबर मोहम्मद ) का
पवित्र पार्थिव शरीर ढका हुआ था।
हज़रत उमर (रजि.) अपने पर
काबू नहीं पा रहे थे। सारे मुसलमान
बेखुद और बदहवास थे और
हज़रत अबू-बक्र (रजि.) उन्हें
समझा रहे
थे कि यह खदा की मर्जी है।
मोमिन की शान यह है कि वह
खुदा की
मर्जी को खशी-खशी गवारा करे।
उसके हर फ़ैसले को अपने लिए
बेहतर समझे। 

सदैव उसकी इच्छा पर सन्तुष्ट रहे।
इतने में एक आदमी दौड़ा हुआ
आया और उसने कहा “अबू-बक्र!
उमर! सब अनसार जमा हैं।
अपने में ख़लीफ़ा चुन रहे हैं।
जल्दी चलो, वरना एक फ़ितना उठ
खड़ा होगा। मुसलमानों में फूट
की आग भड़क उठेगी।"

हज़रत अबू-बक्र (रजि.) और
हज़रत उमर (रजि.) फ़ौरन दौड़े
हुए गए। हज़रत अबू-उबैदा (रजि.)
भी साथ थे। देखा तो वास्तव में सारे
अनसार जमा थे। कुछ मुहाजिर
भी वहाँ मौजूद थे। खूब गर्मागर्म
बहसें और एक-दूसरे पर चोटें हो
रही थीं।

उन लोगों ने पहुँचकर हालात
पर काबू पाया। हिकमत से लोगों को
समझाया-बुझाया। आखिर सबने
सलाह की। हज़रत अबू-बक्र (रजि.)
ख़लीफ़ा चुन लिए गए। सारा
झगड़ा ख़त्म हो गया।

आप ( पैगंबर मोहम्मद ) का
पवित्र पार्थिव शरीर उसी तरह रखा था।
घर और ख़ानदान के लोग उसे
घेरे हुए थे और आप (पैगंबर मोहम्मद )
को आँसुओं की श्रद्धांजलि
अर्पित कर रहे थे।

ख़लीफ़ा का चुनाव हो चुका तो
आप (पैगंबर मोहम्मद ) के
कफ़न-दफ़न का शान्तज़ाम हुआ।
आप (पैगंबर मोहम्मद ) को
नहलाया गया। नहाने के बाद तीन
कपड़ा में कफ़न दिया गया। फिर
मुसलमानों को मौक़ा दिया गया कि
हबूब (पैगंबर मोहम्मद ) पर
आख़िरी नज़र डाल लें और दुआ व
नमाज़ से भी निबट लें।

आप (पैगंबर मोहम्मद ) के पवित्र
शव के आस-पास साथियों की
भीड़ थी कि प्रेम और श्रद्धा में डूबी
हुई यह आवाज़ कानों में आई

"ऐ अल्लाह के रसूल! सलामती
हो आप पर! खुदा की रहमतें
और
बरकतें हों आप पर! हम गवाह
हैं कि आपने रब का पैग़ाम पहुँचा
दिया। और दीन के लिए जान
लड़ाते रहे। यहाँ तक कि अल्लाह
ने उसे ग़ालिब कर दिया।"

यह आवाज़ आप ( पैगंबर मोहम्मद )
के गुफा के साथी हज़रत
अबू-बक्र (रजि.) की आवाज़ थी। मर्द
नमाज़ से निबटे तो औरतों की
बारी आई। फिर बच्चों को भी
मौक़ा दिया गया। लोग विकल आते थे
और सजल नेत्र लिए वापस जाते थे।
Death of Prophet Muhammad


इन्तिकाल के दो दिन बाद आप
( पैगंबर मोहम्मद ) क़ब्र में
लिटाए गए और फिर क़ियामत
तक के लिए निगाहों से ओझल हो गए।


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